लंग्ज़ा – टेथिस समुद्र के जीवाश्मों का खज़ाना (Langza, Himachal Pradesh)

वानस्पतिक आवरण से रहित स्पीति की बर्फीली ठंडी रेगिस्तानी पहाड़ी घाटी में १४,५०० फीट की ऊँचाई पर लंग्ज़ा को आमतौर पर “फॉसिल विलेज” के रूप में जाना जाता है। रोहतांग दर्रे से होकर लंग्ज़ा तक पहुंचने के लिए खतरनाक सड़कें निश्चित रूप से कमजोर दिल वालोंके लिए नहीं हैं। खराब सड़कों पर गहरे घुमावदार मोड़ होते हैं, और जिनके दूसरी तरफ कोई अवरोध नहीं होता है जिस कारण ज़रा सी चूक होने पर सीधे बर्फीली घाटी में गिरने की पूर्ण संभावना होती  हैं, इसलिए ये चक्करदार ऊंचाइयां हर किसी के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।

 

यह वास्तव में बहुत लुभावनी लेकिन कठिन यात्रा है। नीले आसमान के साथ पिघलते हिमनद, चट्टानी पर्वत और दूर दूर तक चोटियों पर हल्की हल्की बर्फबारी दिखाई देती है।

 

“इस मध्य भूमि” के सुरम्य स्थलों को कैमरे अथवा वीडियो  में कैद नहीं किया जा सकता। संभावना है कि यदि आप बेमौसम यात्रा करते हैं, तो घंटों चलने पर या शायद पूरे दिन में भी आपको कोई नजर ही न आए, लेकिन इन पहाड़ों और इनकी हवाओं में कुछ ऐसा असर है जो आपको जीवन और इस संसार को एक अलग दृष्टिकोण से देखने के लिए बाध्य करता है।

 

हिमालय का सन्नाटा विस्मयकारी है और आधुनिक संसाधनों के संचार और उपलब्धता की कमी कुछ के लिए भयावह तो कुछ के लिए वरदान साबित होती है।

 

मैंने सितंबर में ही मनाली से, “इंडियाना जोन्स” की तरह यात्रा आरंभ की। मैंने जाना कि स्थानीय लोगों को जीवाश्मों के अस्तित्व के बारे में काफी जानकारी थी । मुझे कई भूवैज्ञानिकों द्वारा सलाह दी गई थी कि जीवाश्मों को पर्यटकों को न बेचा जाए और इसके बजाय इस खजाने को संरक्षित किया जाए और साथ ही जीवाश्म शिकार से संबंधित किसी भी पर्यटन को प्रोत्साहित न किया जाए। लेकिन, यह शायद स्थानीय लोगों द्वारा पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है क्योंकि सर्दियों के लिए उनकी मुख्य चिंता ईंधन है।

 

मैंने स्थानीय लोगों से सीखा कि जीवाश्म पूरे रास्ते में पाए जाते हैं और थोड़ी सी खुदाई में आसानी से मिल जाएंगे।

 

ऐसी मान्यता है कि इन जीवाश्मों के यहां पाए जाने का कारण मुध और गुलिंग में भारतीय और यूरेशियन टैकटोनिक प्लेटों का आपस में टकराव था।  जिसके कारण ये यहां बहुतायत में पाए जाते हैं।

 

कितने आश्चर्य की बात है! एक समय में जब डायनासोर स्वच्छंद रूप से इस  पृथ्वी पर विचरण करते थे, तब गौरवशाली हिमालय समुद्र की गहराइयों में डूबा हुआ था। भूवैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे ही दोनों प्लेटें एक-दूसरे के करीब आईं, उन्होंने टेथिस सागर को अवरुद्ध कर दिया जो उनके बीच में था। यहीं कारण है कि टिथिस सागर में बसे मोलस्क के जीवाश्म स्पीति घाटी में बड़ी संख्या में बिखरे हुए हैं जो पृथ्वी के इतिहास में सबसे गहरी भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक है।

 

मुझे ये जीवाश्म जैसा कि नीचे दी गई तस्वीरों में देखा जा सकता है, बुद्ध की भव्य मूर्ति के पास कैफे की दीवार पर मिला। ये सर्पिल गोलाकार समुद्री गोताखोरों द्वारा “ऐमोनाइट” के रूप में जाना जाता है जो डायनासोर की तरह लगभग उसी अवधि में लुप्त हो गए – लगभग  ६५ मिलियन साल पहले। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि इन “ऐमोनाइट” को व्यापक रूप से प्रजनन करने के लिए जाना जाता था, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में जीवाश्म पाए गए।

   

यह अध्ययन किया गया है कि लंग्ज़ा खंड में टैगिंग (चूने केपत्थर) और स्पीति गठन (काले रंग की शाल) शामिल हैं जो कि जुरासिक काल के आरंभ से लेकर अंत काल तक की हैं ।

 

मैं खुदाई करने के लिए उत्साहित थी। मुझे एक स्थानीय निवासी ने सड़क के बगल में चौदुआ की खोज करने और नरम चट्टानों कि तलाश करने के लिए कहा जो कि खुलने पर सर्पिल या परिपत्र सरणी की आकृति जैसे दिखते है।

 

अपने भरोसेमंद ड्राइवरके साथ एक कैमरा और एक छड़ी लेकर में उन पत्थरों को कुरेदने लगी जो कि सड़क के किनारे पड़े थे। तपती धूप में लगभग आधे घंटे की खोज के बाद, हमें आखिरकार एक नरम चट्टान मिली। हमने चट्टान पर जैसे ही प्रहार किया वह दो टुकड़ों में विभाजित हो गई और सुंदर सर्पिली आकृतियां उभर कर सामने आईं।

 

उसे देखकर मुझ नौसिखिया को “इंडियाना जोन्स” जैसी अनुभूति हुई।

 

विश्वास नहीं होता कि हिमालय पर्वत श्रृंखला जो की बाकी पर्वत श्रंखलाओं की अपेक्षा अधिक प्राचीन नहीं मानी जाती, अपनी गोद में इस समुद्री जीव को  १५० मिलियन वर्षों से सहेज कर रखे है।

   

कुछ क्षणों के लिए मैं इस खोज के आनंद में ऐसे डूब गई जैसे मुझे कोई अनमोल खजाना मिल गया हो। सृष्टि की उस सृजनात्मकता और बदलते मौसम के अनुसार उन्हें संजोए रखने की क्षमता के आगे में पूर्ण रूप से नतमस्तक हो गई। उस सिफ्लपोड की खोज ने मुझे सृष्टि की सुंदरता का अहसास कराया जो इस समय मेरी हथेलियों में सुशोभित था।

 

लेखिका: लक्ष्मी सुब्रह्मणियन (https://sahasa.in/2020/06/26/langza-a-treasure-for-tethys-sea-fossils/)

हिंदी अनुवाद: गीता खन्ना बल्से

 

* तस्वीरें केवल प्रतीकात्मक हैं (सार्वजनिक डोमेन / इंटरनेट से ली गई हैं। अनजाने में हुए कापिराइट नियमों के उल्लंघन के लिए खेद है ।)

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