गुजरात का भलिया गेहूं (Bhalia Wheat, Gujarat)

गुजरात के स्थानीय निवासियों का मानना है कि भाल नामक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उगाए जाने वाले गेहूं का नाम संस्कृत के शब्द भाल के ऊपर पड़ा है, जिसका अर्थ है ‘मस्तक’, ऐसा इसलिए है क्योकि यह क्षेत्र भी मस्तक के समान सपाट दिखता है। यह सुनने में अजीब लगता है, परन्तु वास्तव में यहां की भूमि एकदम सपाट है और दूर दूर तक कहीं भी हरियाली के दर्शन नहीं होते।

   

इस गेहूं को स्थानीय भाषा में भलिया गेहूं और दोध कनी (दाऊद खानी) या फिर चासिया गेहूं या कथा गेहूं के नाम से भी पुकारा जाता हैं, जो यहां की विशेष भौगोलिक परिस्थितियों में ही पनपता है। यह लंबे दानेवाला गेहूं, अन्य किस्मों के गेहूं की अपेक्षा डेढ़ गुना लंबा होता है। इसे पनपने के लिए सिंचाई अथवा बारिश के पानी की आवश्यक्ता नहीं होती, इसके लिए मिट्टी में संरक्षित नमी और जाड़ों की ओस ही काफी है।

 

भलीया गेहूं की खेती, गुजरात के अहमदाबाद, भावनगर और खंबात के क्षेत्रों में कि जाती है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस गेहूं की खेती सदियों से बिना सिंचाई यानी कि केवल  मिट्टी में संरक्षित नमी से ही की जाती रही है। यह वर्षा के पानी से सोखी हुई, हल्की या मध्यम काली मिट्टी में, भाल तथा उसके आस पास के तटीय क्षेत्रों में बहुत अच्छा उगता है।

 

वर्षा ऋतु के दौरान, किसान खेतों में चारों ओर ४५ से ६० सेंटीमीटर ऊंची मेड़ बना देते हैं जिससे कि वर्षा का जल इकट्ठा किया जा सके। मानसून थम जाने के बाद बैलों की सहायता से भूमि की गुड़ाई की जाती है। इस प्रक्रिया को फिर से महीन मिट्टी की परत बनाने के लिए दोहराया जाता है, जिसे पेन्ह कहा जाता है, जो मिट्टी में घास को परत का काम करती है जिससे मिट्टी की नमी बनी रहे। आमतौर पर बुवाई का काम अक्टूबर माह के अंत में या नवंबर के शुरू में किया जाता है। बुवाई के बाद गेहूं को न तो वर्षा का पानी मिलता है और न हीं इसकी सिंचाई की जाती है पर ये इन्हीं परिस्थितियों में फलता फूलता रहता है।

 

इसकी कटाई हंसिए से की जाती है। इसके ऊपर का छिलका निकलने के लिए थ्रेशिंग मशीन का उपयोग किया जाता है या फिर इनके ऊपर ट्रक चलाया जाता है। भंडारण के पहले इन्हे अच्छी तरह से सूखा दिया जाता है, क्योंकि अनाज का भंडारण जीवन इसकी नमी पर निर्भर करता है (दस प्रतिशत से कम नमी को प्राथमिकता दी जाती है)।

 

यह उच्च कोटि का गेहूं गुजरात में अपने उत्तम स्वाद और प्रोटीन की भरपूर मात्रा होने के कारण सबसे अच्छा माना जाता है। यह गेहूं तेल और पानी को कम मात्रा में सोखता है और अपनी विशिष्ट गुणवत्ता के कारण कीट अवरोधक भी होता है।.

   

भलीया गेहूं सख्त दाने वाला, प्रोटीन से युक्त और कैरोटीन तत्व अधिक मात्रा में होने के कारण रवा, पास्त्ता, मैक्रोनी, स्पेगेटी और सिंवैया बनाने के लिए बाहुतायत में प्रयोग किया जाता है।

 

इस गेहूं का सेवन भाकरी और चपाती के रूप में किया जाता है। इसमें घुलनशील शर्करा अधिक होने के कारण इससे लडडू, चूरमा, हलवा और थूली भी बनाए जाते हैं।

   

प्रतिवर्ष लगभग १.७- १.८ लाख टन गेहूं का उत्पादन २ लाख हेक्टेयर भूमि में किया जाता है। भाल क्षेत्र के किसानों को अन्य गेहूं कि किस्मों के मुकाबले में २५ प्रतिशत प्रीमियम और साधारण गेहूं की किस्मों की तुलना में ४०-५० प्रतिशत अधिक मूल्य प्राप्त होता है।

 

भलिया गेहूं जो कि गुजरात का गेहूं (G W) -1 नाम से बेचा जाता है, अपनी उच्च किस्म, स्वाद और विशिष्ट गुणों के कारण सन २० ११ में भौगोलिक संकेत टैग (जी आईं) का अधिकारी हुआ।

 

लेखिका: लक्ष्मी सुब्रह्मणियन (https://sahasa.in/2020/10/05/bhalia-wheat-of-gujarat/)

हिंदी अनुवाद: गीता खन्ना बल्से

 

* तस्वीरें केवल प्रतीकात्मक हैं (सार्वजनिक डोमेन / इंटरनेट से ली गई हैं। अनजाने में हुए कापिराइट नियमों के उल्लंघन के लिए खेद है।)

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